घरातील व हवेतील धुळ नियंत्रण कसे करावे.


शहर गतीने वाढताहेत. खरं ती आधुनिक विकासाला लाभलेला (ऑबेसिटी) लठ्ठ पणासारखा आजार आहे. जागेवरच सुजत चाललेय. असो. शहरं जशी वाढताहेत तसे प्रदुषण वाढत आहे. हे प्रदुषण अनेक अंगाने फोफावत आहे. ध्वनी, जल, जमीन, हवा, प्रकाश असे सर्वव्यापी झाले आहे. यातील सर्वात महत्वाचे जे आहे ते हवेतील प्रदुषण होय. या हवेत स्वच्छ हवा, प्राणवायूचा अभाव, विषाणूंचा वावर तर आहेच. पण सोबत त्यात सुक्ष्म धुलिकण (डस्ट) सुध्दा आहे. ही धुळ अनेक गोष्टीची असते. वाहत्या वार्यात मातीचे सुक्ष्म कण, औद्योगीक वसाहतीमुळे चिमणीतून विविध पदार्थाचे सुक्ष्म अवशेष उदाः काजळी, तसेच वाहनातून बाहेर पडणारा धुर, गाड्यांचे चाके घासल्याने निघणारी डस्ट ही झाली घराबाहेरची डस्टचे निर्माण होण्याची कारणे, तर घरात सुध्दा कोंदट जागेत अडगळीवर, पुस्तकांवर साचलेला धुळीचा थर. ईलेक्ट्रॉनिक साधनावर साचणारी धुळ, खिडकीला लावलेल्या जाळीवर साचणारी धुलीकण व धुळ.  

वातावऱणात धुळ आहे हे ओळखणे सोपे आहे. बाहेरून घरात आले की चेहर्यावर स्वच्छ रूमाल फिरवायचा. त्यावर काळ्या रंगाची धुळ चिटकून येते. तर घरातील धुळ ही त्यावर हात फिरवावा म्हणजे हाताला ति लागलेली दिसते.

या डस्टला आपण अनेक अंगानी रोखू शकतो. त्यावरच सविस्तर लेखन केले आहे.

  • चेहर्यावर मुस्क (मास्क) लावणे गरजेचे आहे. कोरोना असो कि नसो आता हा मास्क वापरणे फार गरजेचा आहे. नाकात जाणारी सुक्ष्म धुलिकण रोखले जाणार आहे कोरोना हा आजार जाईलही पण वातावऱणातील धुळ कधीच जाणार नाही. उलट ती या पुढे दिवसेंदिवस वाढतच जाणार आहे.
  • घराभोवती झाडे लावाः घरा भोवती शक्य असल्यास झाडे लावा.  मोठ्या पानांची, छोट्या पानांची अशी कोणतीही चालतील. त्यात वावटळी व वार्या मुळे निर्माण होणारी धुळ ही रोखली जाते.
  • तसेच घरा भोवती, छतावर भाजीपाल्याची बाग फुलवा किंवा वाफ्यामधे फळझाडे लावा.
  • घरा बाहेर उपलब्ध जागेत किंवा  घरात कुंड्या मधे अरेका पाम लावा. अरेका पाम हा प्राणवायू तयार तर करतोच पण डस्ट सुध्दा खेचून घेतो. अर्थात ही डस्ट जमल्यास रोज किंवा आठवड्यातून एकदा तरी ती स्पंजने टिपून घ्यावी.
  • हॅंगीग गार्डेन तयार करा. बरेचदा डस्ट ही बाल्कनी, खिडकीतूनही घरात येत असते. त्यामुळे तेथे लोंबकळणारी झाडे लावा. बर्यांच अंशी डस्ट ही रोखली जाते.
  • वास्तू शाश्त्र अभ्यासून घरात ठेवता येणारी झाडे घरात ठेवा, पॅसेज, पायरीवर ठेवा. म्हणजे प्राणवायू तर मिळेलच पण डस्ट सुध्दा आकर्षिली जाईल.
  • यासाठी शॅडो लव्हींग, पार्शल शेड मधे येणारी झाडे कोणती त्याची निवड करावी. तसेच कमी काळजी घेता येईल अशीच झाडे निवडा.
  • वरील सार्या गोष्टी दुकान, कार्यालय या ठिकाणी सुध्दा अवलंबता येईल.

या झाडांना वेळोवेळी स्पंजने पुसून घ्या किंवा स्प्रे ने त्याला स्वच्छ करणे गरजेचे आहे. कारण त्यांच्या पानातील रंध्रावर डस्ट साचली तर अन्न प्रक्रिया करता येत नाही. नंतर ते आजारांना बळी पडतात.

संदीप चव्हाण, गच्चीवरची बाग, नाशिक.

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दिवार पर उगे बरगद औऱ पिपंल को कैसे नष्ट करे?


How to Remove Peempal & Baiyan tree growing out of concrete

  आज तेज रप्तार से शहरीकरण बढ रहा है। सिमेंट का विराण जंगल बढ रहा है। लेकीन निसर्ग अपना काम सुक्ष्मता से हर जगह, हर संभव, हर प्रयास कर रहा है, करता रहता है। बडी बडी बिल्डींग्स बन रही है। पंछी निवास के लिए आते है। पंछीयों के विष्टा से खास कर कौओ के विष्टा से बरगद और पिंपल के पेड उगते है। बरगद और पिपंल की जडे आक्रमक होती है। पेड बडे होते है लेकीन बिज बहोत ही सुक्ष्म होता है। बरगद औऱ पिपंल के पेड सिमेंट के घरो पर उगते है। उनकी जडे आक्रमक होने कारण सिमेंट के दिवारों को दरारे आने लगती है। दरारों के वजह वहांसे पानी का संग्रह होना, सिमेंट का मिट्टी मे बदलाव होना और तो और छत, दिवार टिपकना, गिली होने का संभव होता है।

बहोत सारे लोग ऐसे पेडों को निकालने का प्रयास करते है। लेकीन उनका तरीका गलत होने कारण वह बारबार बहर जाते है। भले ऐसे पेडो को पत्ते कम हो लेकीन जडं जादा अंदर तक विकसीत हुई रहती है। ऐसे पेडो को पारंपरीक तरीकेसे लिकानेके जो तरीके है उसको पहेले देखेंगे और वह तरीके सबके सब गलत है।

  • पहला तरीका: बरगद औऱ पिपंल जहां उगकर आते है उसे चार छे महिनेमें जब याद आये तब छाटा जाता है। वो भी सिर्फ उसकी छोटी छोटी टहनियां को। जडे को तो हात नही लगा सकते क्यों की वह पहलेंसें ही दिवारमें जमी होती है।
  • दुसरा तरीका: ऐसे पेडों के निकालकर उसकी जडं पर ॲसीड डाला जाता है। लेकीन ऐसे ॲसीड का उपयोग खतर नाक और जानलेवा हो सकता है। औऱ तो और उसे उंचाई पे छिडकना और उपरसे डालना गंभीर समस्या निर्माण कर सकता है। इसलिए ॲसिड का प्रयोग और ईस्तेमाल कतई ना करें।

पहला वाला तरीका आधा गलत है। और दुसरा तरीका पूराही गलत है।  पहला वाला तरीके में सुधार करके उसे तंतोततं अगर लागू करेंगे तो उसका परिणाम आश्चर्यकारक मिलते है। औरे समस्यासे मुक्ती मिल जाती है।

कही भी अनचाही जगह पर अगर बरगद और पिपंल के उगते है तो उसे बारी बारी से छाटते रहना जरूरी है, यह छाटना हर हप्ते होना चाहिएं। ईसमे बिलकूलही खंड नही करना। बहोत सारे लोक छटाई तो करते है। लेकीन उसे चार छह महिने छोड देते है। वो फिरसे और बडे जोर से बहरर आता है। अगर आप हप्ते में एक बार उसे धारधार चाकू से छाटेंगे, कांटेंगे, जडों को भी हानी पहुचांएगे तो वो उसकी बढने की गती रुक जाती है।

अब ऐसा करने में असल विज्ञान कैसे काम करता है? वह हम जानेंगे । कोई भी पेड का मुख्य अन्न भांडार ये जडों में होता है। आप उपर से पत्ते छाट लेंगे लेकीन अंदर का संग्रहीत अन्न भांडार उसको पूरी जोर से उसे प्रोत्साहीत और प्रेरीत करके पत्ते को बढने के लिए मदद्त करते है। क्योंकी पत्ते से अन्न बनाकर हो जडों में संग्रहीत करना जरूरी होता है। आप अगर हप्ते में पत्तो को छाटते रेहेंगे तो सिर्फ जडों से अन्न का प्रवाह होता रहेगा। और एक दिन जडों का संग्रहीत अन्न खतम हो जाएगा। ऐसे करेंगे तो एक दिन जडभी खतम हो जाता है। और ईस तरिके से बरगद औऱ पिंपल का पेडं नष्ट हो जाता है। ध्यान रखे समस्या को जड से मिटांना हो तो उसपे बार बार काम करना पडता है। आप आसान तरिका अपनांएगे तो ॲसीड की तरह खतरनाक हो सकता है।

संदीप चव्हाण, गच्चीवरची बाग, नाशिक.

http://www.chat-par-khet.com

Needs to equipments/ funds


vertical garden 1 1 (1098)संदीप चव्हाण, नाशिक, महाराष्ट्र में रहते है। पिछले चार साल से गारबेज टू गार्डन तंत्र को लेकर नाशिक में जहर से मुक्त सब्जिया और बागवानी बनाने के लिए लोगोंको प्रेरीत करते है। उनका सपना है की लोग अपने छोटी छोटी कौशिसे व्दारा जहर मुक्त सब्जिया घरपर ही उंगाये, पर्यावरण का खयाल रखे और निसर्ग के साथ जुडे रहे। इसलिए खेती की जरूरू नही है। शहर में जो भी जगह उपलब्ध है जैसे की (पंराडा, टेरेस, बाल्कनी, विंडो) उसीमें उपलब्ध नैसर्गिक संसाधनो (किचन वेस्ट, सुखे पत्ते,)  के साथ और जो भी उपलब्ध वस्तूंए में बागवानी करने के लिए प्रेरीत करते है। आज शहर में डंपीग ग्रांऊड की समस्या बढ रही है। अगर लोगों ने इस तरह किचन वेस्ट का जगह ही पर उसका सुखाकर इस्तेमाल किया तो डंपीग ग्रांऊड की समस्या नही रहेगी। और यह एक कारगर व आसान तरीका है। किचन वेस्ट का कंपोस्टिंग बनाने की कोई जरूरी नही.. ऐसा उनका कहना है। खाद बनाना यह प्राकृतिक के खिलाफ है और उसमें समय का गवाना है यह उनका मानना है।

इसलिए वह पिछले १२ साल से प्रयत्न कर कर रहे है। इस प्रयत्नों के पिछले चार साल में अपने परिवार के लिए उपजिवाका का माध्यम बनाया है। उनके साथ उनका परिवार और दो लोगों को भी रोजगार की प्राप्ती होती है।

जहर मुक्त खेती की आज बहूत जरूरी है। इसके बारे में लोगों को जागृत करना और निसर्ग के प्रती उनका सहयोग लेना जरूरी समजते है। इसलिए उन्होंने एक देशी नस्ल की गाय पाली है। उसीके गोमुत्र और गोबर से टेरेस फार्मिंग में उपयोग करते है।  इस काम को गती मिलने के लिए लंबे प्रयोसो के बाद एक चार पैयावाली गाडी खरेदी है। उसीसे थोडा आसानी हो गयी है। लेकीन यह सब कर्जा है। और कुछ कुछ करना है। उसके लिए और कर्जा मिलना मुश्किल है। और उनके सपने की कडी में कुछ साधनों की कमतरता है। अगर निचे नमुद कियें हुंए साधन का जुगाड हो जाता है तो  में पर्यावरण के क्षेत्र में लोगोंका और बडी मात्रा में सहयोग ले सकत है। और अपनी सिंमेंट की निस्तेज वंसुधरा को हरे हरे रंग के कुछ रंग भरना चाहते है।

  • Petrol Shredder machine 65000/- छत पर बागवानी के लिए 80 % बायोमास ( नारियल के छिलके, गन्ने का छिलके, पेड पौध्दे के पत्ते, सुका हुआ किचन वेस्ट और 20%  मिट्टी और खाद का उपयोग करते है। उपरोक्त मशीन व्दारा जो भि बायोमास लोगोव्दारा फेका या जलाया जाता है। उनको क्रश करके उपयोग कर सकते है। इससे दो फायदे है। एक  कम जगह में जादा से जादा संग्रहीत कर सकते है। और ट्रान्सपोर्ट के लिए सुविधा होगी।
  • किताब प्रकाशन 75000/- अब गच्चीवरची बाग ( टेरेस फार्मिंग) ये किताब की व्दितीय आवृत्ती प्रकाशीत करना चाहते है। जो स्वः एक प्रशिक्षण पुस्तिका की तरह होगी। ताकी इसे पढकर इच्छुक लोंग अपने घरपे ही किताब पढकर छत पर बागवानी कर सकते है। इससे पर्यावरण के क्षेत्र में बढा काम खडा रह सकता है।
  • बफींग machine 10000/- मंदीर से जमा किए नारियल के कठीण कवच से मैं किचेन्स बनाना चाहते है। कुछ चिंजे हातोसेही बनायी है इसमें बहोत सारा वक्त लग जाता है। उपरी मशीन अगर मिल गयी तो मैं कोकोनट शेल से अलग अलग चिंजे बना सकते है। जो पर्यावरण पुरक होगी। और स्थानिक महिलांए के लिए रोजगार की प्राप्ती होगी।

Total amt: 150000/-(1.5 lakh)

उनके कार्यपर युट्यूब पर एक फिल्म है उसे हर रोज २५० लोग देखते है। इसी विषय में मैने लोकसत्ता इस वर्तमान पत्र में एक साल कॉलम लिखा है। इसी काम की विविध माध्यमों व्दारो समाचार पत्र में जीवन परिचय प्रकाशित हुए है।

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